आईपीआर थिंक टैंक और बौद्धिक संपदा नीति का विवाद – भारत

24 अक्टूबर 2014 को भारत सरकार ने राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति का मसौदा तैयार करने और आईपीआर मुद्दों पर औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग को सलाह देने के लिए एक आईपीआर थिंक टैंक का गठन किया। आईपीआर थिंक टैंक में छह सदस्य हैं:

  1. जस्टिस (सेवानिवृत्त) प्रभा श्रीदेवन, अध्यक्ष;
  2. सुश्री प्रतिभा एम सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता, सिंह और सिंह लॉ फर्म, सदस्य;
  3. सुश्री पुनीता भार्गव, वकील, इंवेंटचर आईपी, सदस्य;
  4. डा उन्नात पंडित, कैडिला फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड, सदस्य;
  5. श्री राजीव श्रीनिवासन, निदेशक, एशियाई स्कूल ऑफ बिजनेस, तिरुवनंतपुरम, सदस्य;
  6. श्री नरेन्द्र के सबरवाल, सेवानिवृत डीडीजी, डब्ल्यूआईपीओ, सदस्य और संयोजक.

विवाद- आईपीआर थिंक टैंक

आईपीआर थिंक टैंक रचना के समय से ही विवादों में रही है, उस पर कथित रूप से निम्न आरोप भी लगाए गए हैं:

  • पॉलिसी बनाने में मनमानी और तदर्थ दृष्टिकोण.
  • कुछ विवादों में सदस्यों की व्यक्तिगत रूचि.
  • कुछ सदस्यों की प्रासंगिक विशेषज्ञता का अभाव.
  • सभी हितधारकों के प्रतिनिधित्व का अभाव।

द फ्रंटलाइन पत्रिका के लेख, ‘ब्रीच ऑफ़ प्रॉमिस ओन आईपीआर पालिसी?’ ने विवादों पर विस्तार से चर्चा लिखी है. हालांकि, बौद्धिक संपदा नीतियों की समस्यायें आईपीआर थिंक टैंक के गठन के विवादों की तुलना में कहीं अधिक जटिल है। 1994 में भारत में बौद्धिक संपदा के ढांचे में भारी परिवर्तन हुआ जब भारत सरकार ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा अनिवार्य ट्रिप्स समझौते के माध्यम से एक विकसित बौद्धिक संपदा प्रणाली को स्वीकार कर लिया था। यह स्पष्ट था कि एक अविकसित बाजार में एक विकसित प्रणाली को अपनाने से भविष्य में सामाजिक और व्यापार की समस्याएं पैदा होंगी। दो दशक से अधिक समय से भारत ने एक विकसित बौद्धिक संपदा प्रणाली को अपनाया लेकिन अब भी कोई ठोस नीतियों का कोई ढांचा नहीं है, जब की सामाजिक और व्यापार की समस्याएं स्पष्ट हैं| भारत के बौद्धिक संपदा कानून 1 जनवरी, 2005 को ट्रिप्स आवश्यकता के अनुरूप थे। तब से भारत में विभिन्न अदालतों में पेटेंट और कॉपीराइट के क्षेत्र में नीतिगत मुद्दों को लेकर कई मामलों में मुक़दमे दायर किये गए हैं।

भारत में गैर-मौजूद दीर्घकालिक बौद्धिक संपदा नीति ढांचे के मुख्य कारणों में से एक यह तथ्य है कि कानूनी विशेषज्ञों ने आर्थिक विश्लेषण या प्रयोगसिद्ध अनुसंधान के बिना केवल कानूनी साधनों का उपयोग करके बौद्धिक संपदा नीति तैयार की है। जबकि, विकसित आईपीआर सिस्टम को अपनाने के परिणामस्वरूप पैदा हुई ये सामाजिक और व्यापार की समस्याओं को एक आर्थिक विश्लेषण और प्रयोगसिद्ध अनुसंधान की आवश्यकता है, साथ ही साथ अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सलाह और राय की आवश्यता है।