भारत में मानवाधिकार के बिना बौद्धिक संपदा उत्पादन की आकांक्षा

बौद्धिक संपदा कानून भारत के लिए नई खोज नहीं हैं। 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद से पेटेंट और कॉपीराइट कानून अस्तित्व में रहें हैं। ये कानून हमें अंग्रेजों से विरासत में मिले थे। भारत ने आज़ादी के बाद भी एक कमज़ोर पेटेंट कानून अपनाया क्यूंकि भारत ज्यादातर टेक्नोलॉजी विकसित देशों से आयात करता रहा है। पेटेंट के विपरीत, भारत ने 1947 में स्वतंत्रता के बाद अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के अनुरूप अपने कॉपीराइट कानून में निरंतर परिवर्तन किए।

1994 में ट्रिप्स समझौते को अपनाने के बाद भारत को अपने पेटेंट कानून में महत्वपूर्ण बदलाव करना पड़ा। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत को ट्रिप्स समझौते के तहत अपना दायित्व को पूरा करने के लिए अपने कॉपीराइट कानून में बहुत कम बदलाव करना पड़ा था। हालांकि आज तक कॉपीराइट उद्योग यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह विकसित नहीं हो पाया है।

और आश्चर्य की बात है की भारत में पिछले १० साल से एक विकसित पेटेंट कानून लागू है, पर हम लोग अभी भी भारत से एक बड़ी खोज या आविष्कार की प्रतीक्षा कर रहे हैं|

भारत में बौद्धिक संपदा के उत्पादन की कमी के कारणों में से एक ख़राब शिक्षा प्रणाली को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जिसमे की रट के याद रखने पर ज्यादा जोर दिया जाता है और गहन सोच को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है। हालांकि, ख़राब शिक्षा प्रणाली की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण कारण यह तथ्य है कि आज भी भारत में वास्तविक और प्रभावी मानवाधिकार नहीं हैं। भाषण और अभिव्यक्ति की किसी भी वास्तविक स्वतंत्रता के बिना हमारे दिमाग से कुछ भी पैदा करना लगभग असंभव है। यदि मन सोचने और अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र नहीं है तो हम भारत में किसी भी बौद्धिक संपदा को कैसे बनाने की उम्मीद करते हैं। आख़िरकार, बौद्धिक संपदा हमारे मन की रचनाएँ हैं।